कभी साया है,कभी धुप मुकद्दर मेरा,होता रहता है यूं ही कर्ज बराबर मेरा।
टूट जाते है कभी मेरे किनारे मुझमे,
डूब जाता है कभी मुझमे समन्दर मेरा।
किसी सेहरा में बिछड़ जायेंगे सब यार मेरे,
किसी जंगल में भटक जाएगा लश्कर मेरा।
बावफा था तो मुझे पूछनेवाले भी न थे,
बेवफा हूं तो हुआ नाम भी घर-घर मेरा।
कितने हंसते हुए मोसम अभी आते लेकिन,
एक ही धुप ने कुम्हला दिया मंजर मेरा।











एक टिप्पणी भेजें
आपका प्रतिक्रिया और सूझाव हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस ब्लाग पर कोई आपतिजनक या कोई खामिया अगर आपको नजर आऐ तो हमे पूर्ण विवरण सहित सूचित करे,मै उसमे सुधार करुंगा या उसे हटा दूंगा।